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कश्मीर मुद्दा, विवाद का इतिहास एवं कारण

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कश्मीर, कहते है कि धरती पर अगर कहीं स्वर्ग है तो बस कश्मीर में ही है। कश्मीर की खूबसूरत वादियां, सफेद जमीन को चीरती हुई हरियाली, कहीं दूर पहाड़ों के बीच में से अपने तेज बहाव पर इतराके आती हुई नदी, ये सुंदर दृश्य देखने को ही बनता है। लेकिन ये जन्नत, ये स्वर्ग आज नर्क बन गया है। कही गोलियों की धमक तो कही बहता हुआ लोगों का खून, तो कही नकाबपोश लोगों का पत्थर फेंकना। ये सब इस स्वर्ग को नरक बनाता है। आखिर क्या कारण है इसका, क्या कहानी है ? आज मैं अपने इस लेख में कश्मीर मुद्दे के पीछे की हकीकत का संक्षिप्त वर्णन करने का प्रयास करूंगा।

1947 भारत अंग्रेजी हुकूमत से आजाद हुआ, और साथ ही अस्तित्व में आया पाकिस्तान। भारतीय स्वतंत्रता एक्ट 1947 के अनुसार सभी रियासतों को निर्णय करना था कि वह भारत से जुड़ना चाहेंगे या पाकिस्तान से जुड़ना चाहेंगे। तत्कालीन समय में जम्मू-कश्मीर देश की सबसे बड़ी रियासत थी, और महाराजा हरि सिंह इस रियासत के शासक थे। हरि सिंह ने तय किया कि वे न तो भारत के साथ विलय करेंगे और न पाकिस्तान के साथ, लेकिन पाकिस्तान को यकीन था कि हरि सिंह पाकिस्तान के साथ विलय कर लेगे। हरि सिंह के द्वारा माना करने पर पाकिस्तान ने अपना असली रंग दिखाया।

पाकिस्तान ने उस समय सबसे पहली बार पीठ पर वार किया और लगातार आज तक कर रहा है। पाकिस्तान ने अपनी सेना को पश्तून आक्रमणकारियों के रूप में जम्मू-कश्मीर पर कब्ज़ा करने भेजा। इन सभी आक्रमणकारियों ने जम्मू-कश्मीर के कुछ स्थानीय मुस्लिम समुदाय से संबंधित लोगों के साथ मिलकर जम्मू-कश्मीर में हाहाकार मचा दिया। हर तरफ बेगुनाह लोगों का खून बह रहा था. उस समय नेहरू सरकार तो – हम क्या करें वाली मुद्रा में – मुंह बिचकाए बैठी थी। सरदार पटेल ने गुरु गोलवलकर से मदद मांगी जो तत्कालीन समय में आरएसएस के सरसंघचालक थे। गुरुजी श्रीनगर पहुंच गये और महाराजा हरिसिंह से मिले। इसके बाद महाराजा ने कश्मीर के भारत में विलय पत्र का प्रस्ताव दिल्ली भेज दिया।

26 अक्टूबर 1947 को महाराजा हरि सिंह और भारत के बीच विलय का समझौता हुआ. लेकिन शर्त ये रखी गई की भारत अपनी सेना को भेजकर आक्रमणकारियों को जम्मू-कश्मीर से खदेड़ दे। भारतीय सेना ने कश्मीर में जाकर पाकिस्तानी आक्रमणकारियों को जम्मू-कश्मीर से खदेड़ना शुरू किया। कश्मीर मुद्दा अब तक अंतरराष्ट्रीय बन चूका था। 1 जनवरी 1948 को सयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद के सामने यह मुद्दा रखा गया. 21 अप्रैल 1948 को सयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद ने प्रस्ताव 47 पारित किया, जिसके तहत युद्ध पर विराम लगाने को कहा गया और पाकिस्तान को जम्मू-कश्मीर से अपनी सेना शीघ्र हटाने के निर्देश दिए।

पाकिस्तान को न चाहते हुए भी अपनी सेना जम्मू-कश्मीर से हटानी पड़ी. लेकिन उसकी नजर आज तक जम्मू-कश्मीर पर बनी हुई है। पाक ने कितनी बार कोशिश की जम्मू-कश्मीर को हथियाने की लेकिन भारत के न जाने कितने वीर जवानों ने अपनी जान देकर जम्मू-कश्मीर की रक्षा की और हर बार पाकिस्तान को हार का मुंह देखना पड़ा। हमें गर्व है अपने वीर जवानों पर उनकी शहादत पर।

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